Sunday, 28 July 2013

नाशाद कानपुरी की एक ग़ज़ल जिसका अनुवाद मेरे मित्र इसरार गुनेश ने किया है

जब तसव्वुर में उनको लाता हूँ
दोनों आलम को भूल जाता हूँ,

उफ़ रे मजबूरियां मुहब्बत की
चोट खाता हूँ, मुस्कुराता हूँ,

जानता हूँ मआले इश्क़ मगर
जानकर भी फरेब खाता हूँ,

सच बता मेरे भूलने वाले
कभी तुझको भी याद आता हूँ,

तेरी जादूबयानियों की क़सम
तेरी बातों में आ ही जाता हूँ,

ख़ार दामन पकड़ ही लेते हैं
लाख 'नाशाद' मैं बचाता हूँ.."

नाशाद कानपुरी
सन १९४८ ई.
 

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