Saturday, 29 March 2014

1)
चुनावी माहौल में 
वे खेल रहे हैं गाली गाली का खेल 
न जाने कौन होगा पास 
और कौन होगा फेल ?
2)
धर्म के नाम पर 
करता है जो धंधा 
वह है गंदा |
इस चुनावी माहौल में 
इन धंधेबाजों के पास 
कोई नेता क्योंकर जाता है
कितना भी मंदबुद्धि हो 
इतना तो उसको भी समझ में आता है |
3)
एड्स से भी खतरनाक बीमारी है धर्म और कुछ लोगों ने इसे धंधा बना लिया है और शेष को अंधा |
4)
मोदी के बहाने शंकराचार्य स्वरूपानंद की भी कुछ चर्चा हो गयी वरना शंकराचार्यों को अब पूछता कौन है ?
5)
मन में सहेजकर
रख लिया था जो कभी चुपचाप
उन पुरानी यादों की
अब नहीं सुनाई देती
खुद मुझे कोई पदचाप
अभी अभी मुझे मालूम हुआ
इस उम्र में क्यों बढ़ गया है रक्तचाप ?
6)
चाही थी 
एक रात 
तुम्हारे साथ 
न तुम आईं
न रात आई |
चाणक्य लड़ाता रहा
चन्द्रगुप्त लड़ता रहा
हमे तो हारना था हार गए
अनुत्तरित रह गया एक प्रश्न कि
आखिर जीता कौन  ?

Tuesday, 25 March 2014

तुम्हारे समक्ष
जब भी खुद को
चाहा व्यक्त करना
तुमने समझा
उसे अपनी आलोचना
तुम बोलते रहे,मैं चुप हो गया
तुम्हे तो मुझसे प्यार है न ?

Monday, 24 March 2014

नींद में नहीं
ख्वाब जिसके पेट में पलते हैं
हम उसी को तो औरत कहते हैं |
परिंदे का
कोई घर नहीं होता
जिसने बनाया घर
वह परिंदा हो नहीं सकता |
जो परिंदे घर बनाते हैं
वे आकाश में
ऊंचाइयों पर उड़ नहीं पाते हैं |
परिंदे का
कोई घर नहीं होता
जिसने बनाया घर
वह परिंदा हो नहीं सकता |
ज़मीन पर
छोटा सा एक घर बना लो
परिंदों की तरह
आकाश में उड़ने का शौक मत पालो |

Friday, 21 March 2014

जो नहीं मिलता
वह स्वप्न में आता है
जिंदगी में जो पाया
वह स्वप्न में कभी नहीं आया
अतृप्त इच्छाएं
स्वप्न में प्रगट होती हैं
वास्तव में घट जाती
तो जिंदगी नरक होती  |

Tuesday, 18 March 2014

राम रहता नहीं मंदिर में
राम जहाँ रहता हैं
वहाँ कोई जाता नहीं
राम और खुदा
एक साथ एक ही घर में
हंसी ख़ुशी रहते हैं |
ऐसे में
मंदिर-मस्जिद के लिए लड़ना
वैसा ही है जैसे
दोनों आँखों का एक-साथ खोना |   

Friday, 14 March 2014

दर्द कहा नहीं जाता
और मौन सुना नहीं जाता
दर्द हमेशा
अनकहा-अनसुना रह जाता है
आदमी हो या औरत सबके भीतर
कुछ अनछुवा रह ही जाता है |  

Wednesday, 12 March 2014

ध्यान से सुनिये
घड़ी कहती है टिक-मत ,टिक-मत
और हम सभी  
घड़ी के कहने पर कहीं टिकते नहीं |
हाँ,कई जगहों पर
हम टिके हुए दिखाई पड़ते हैं
लेकिन सच जानिये हम वहाँ होते नहीं हैं | 

Sunday, 9 March 2014

मन में सहेजकर
रख लिया था जो कभी चुपचाप
उन पुरानी यादों की
अब नहीं सुनाई देती
खुद मुझे कोई पदचाप
अभी अभी मुझे मालूम हुआ
इस उम्र में क्यों बढ़ गया है रक्तचाप ?

Friday, 7 March 2014

आगे भी डर है
पीछे भी डर है ,
डर के सिवा कुछ नहीं है
डरे हुए हैं हम सब
ये डरे हुए लोग
ईश्वर को पैदा न करते
तो क्या करते ?

Tuesday, 4 March 2014

वह नंगा था
उसके चारो ओर
जो भी थे सब नंगे थे
किसी ने किसीको नहीं कहा
कि तुम नंगे हो  |   
पुरानी डायरी १९७९ से
==================
आओ
इस दहलीज को पार कर लें
या उखाड़ फेकें
कहने को अपना यह घेरा
कहीं हमें
निष्कासित न कर दे
क़ैद
निर्वासन से बेहतर है
और दहलीज हमारे भीतर है
हम न इसे पार कर सकते हैं
और न उखाड़ कर फेंक सकते हैं
होगा सीखना
इस दहलीज के साथ जीना  |

Sunday, 2 March 2014

वे नंगे हैं
नंगेपन से बाज़ नहीं आयेंगे
नंगों को नंगा करने की कोशिश क्यों ?

मेरी चिंता है कि  इस कोशिश में
हम अपने कपड़े उतारना न शुरू कर दें  |
मेरे पास पंजा है
उनके पास है साइकिल
वे हाथी पर
सवारी करते हैं मदमस्त
कमल को जमीन पर
उगाने की कोशिश में पस्त
उसके पंजे में झाड़ू है
और वह झाड़ू का इस्तेमाल
सफाई करने के लिए नहीं
डराने के लिए करता है |

हर व्यक्ति पर
कोई न कोई छाप है
और यह एक अच्छी बात है ?