Friday, 31 May 2013

अगर प्रेम है ?
तो सेक्स की आदिम इच्छा ही उसकी जननी है |
कहीं किसी ने गाया :
'मैं तेरा हूँ-तू मेरा है, कैसा यह प्रेम घनेरा है!'
मेरा मन भर आया...अज्ञेय


अज्ञेय की उपरोक्त पंक्तियाँ पढ़कर एक प्रतिक्रया ==

'मैं तेरा हूँ-तू मेरा है,
यह कैसा प्रेम घनेरा है ?
रस्सियों में बाँध लो
और फिर कहो
यह प्रेम का घेरा है |
ख्वाब
=======
सभी का
एक ख्वाब होता है
ख्वाब में रंग भरते भरते
बीत जाती है जिंदगी
फिर भी 
उस ख्वाब का
कोई न कोई हिस्सा
रंगहीन रह ही जाता है
अनजाने ही मेरा ख्वाब
बच्चों का ख्वाब बन जाता है
उस ख्वाब में
रंग भरते भरते
बीत जायेगी उनकी भी जिंदगी
फिर भी रंगहीन रह जाएगा
ख्वाब का कुछ हिस्सा
ख़्वाबों को रंगने की
अंतहीन कोशिश है जिंदगी |

Thursday, 30 May 2013

पुरानी डायरी के पन्नों से कुछ उबड़ खाबड़ सा
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जब तुम
मेरे पास थीं
तब मेरे अहं ने
तुम्हारे अस्तित्व को झुठलाया |
और
अधूरेपन का अहसास भी
अधूरा था
इसीलिए तो
अपने और तुम्हारे
बीच की दूरी भी
आधा ही तय कर पाया |
दूरियां कम हो सकती हैं
तय नहीं की जा सकती
यह सच
मुझे अब समझ में आया 

Wednesday, 29 May 2013

????
=======
झूठ
सम्बंधों को जोड़ता है
सच
सम्बंधों को तोड़ता है
झूठ और सच के बीच
आदमी
कभी रोता है
कभी हँसता है |
शीर्षक
कविता के अर्थ को
समेटता है | 
याद नहीं
कब नम हुई थी आँखें ?
रोना होता है
हँसना होता है
आँखों का नम होना
कुछ कम ही होता है |
मुझे उसने
प्यार किया
बदले में मैंने उसे जिया
न उधार लिया
न उधार दिया
अगर उधार लिया
तो फ़ौरन
चुकता भी तो कर दिया |

Tuesday, 28 May 2013

सम्बन्ध मरते हैं
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व्यक्ति ही नहीं
सम्बन्ध भी मरते हैं |
यह एक
दूसरी बात है कि
कई लाशों को
एक साथ
अपने कन्धों पर
उम्र भर हम ढोते हैं  |

Monday, 27 May 2013

वे कौन ?
========
जिनके वोट
उनके काम न आयेंगे
वे मारे जायेंगे |
जिनके वोट
उनके काम आते हैं
वे उन्हें गोद में बैठाकर
दूध में ज़हर मिलाकर पिलाते हैं |
वे न राष्ट्रभक्त हैं
न धर्म निरपेक्ष हैं |
मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ
वे अपने काम में
बहुत दक्ष हैं |
 
फितरती
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आदमी की फितरत है
जो करने को कहोगे
नहीं करेगा
जो करने को मना करोगे
वही करेगा
बंद रास्तों पर
जानबूझ कर चलेगा |
जिन्होंने तुम्हें पहुँचाई है चोट क्या तुम उनसे बदला लेना चाहते हो ?एक आसान सा तरीका है खुश रहो और जब भी उनसे मिलो मुस्कराते हुए मिलो |

Sunday, 26 May 2013

ढके हुए चेहरे
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टुकड़ों टुकड़ों में
सच को
कैसे जानोगे
केवल उसका हाथ देखकर
तुम उसको कैसे पहचानोगे ?
चेहरे को ढककर
घर से बाहर निकलने का चलन
अब नहीं होता यहाँ कोई मिलन
ढके हुए चेहरों में
कौन है दोस्त
कौन है दुश्मन कैसे पहचानोगे ?
अब तो यही है यहाँ की रीति
कूड़े के ढेर पर पड़ी
रो रही है प्रीति |

Saturday, 25 May 2013

कीचड़ दिखता है
कमल क्यों नहीं दिखता
कीचड़ में ?

हम वही देखते हैं
जो देखना चाहते हैं

जिंदगी के आईने में
ज़ेहन का अक्स उभरता है
अब तो समझ में
आ गया होगा कि आपको
कमल क्यों नहीं दिखता है ?
कीचड़ दिखता है
कमल क्यों नहीं दिखता
कीचड़ में ?

हम वही देखते हैं
जो देखना चाहते हैं

जिंदगी के आईने में
ज़ेहन का अक्स उभरता है
अब तो समझ में
आ गया होगा कि आपको
कमल क्यों नहीं दिखता है ?
आँखों में
=========
खंजर भोंक देते हो
और मुस्कराने को कहते हो |
आँखों ने
तुम्हारा कहना मान लिया है
अपने भीतर
समंदर को पाल लिया है |

Friday, 24 May 2013

गिद्ध राजा
========
जहाँ
हर ऊँचाई पर
बैठे हो गिद्ध
कैसा होगा
उस देश का भविष्य ?
पूरी की पूरी फ़ौज व्यस्त है
लाशों का जुगाड़ करने में |
वे जानते हैं
गिद्ध जब भूखा होता है
सड़े हुए मांस की
फरमाइश करता है |
आज देश में
कुछ नहीं हो रहा है
सिर्फ गिद्ध का संकल्प
और स्वार्थ सिद्ध हो रहा है |
जहाँ
हर ऊँचाई पर
बैठे हो गिद्ध
यही तो होगा
उस देश का भविष्य |
देश की जनता को खा जा
गिद्ध राजा |

Wednesday, 22 May 2013

सैलानी का
कोई घर नहीं होता
रास्तों पर रहता है
रास्ते पर सोता है
और रास्ते के कन्धों पर
सिर रखकर रोता है 
सैलानी का
कोई घर नहीं होता 

Tuesday, 21 May 2013

स्टेटस=== सेक्स को प्रेम का नाम देने की परंपरा कभी ख़त्म होगी क्या ? वासना के प्रकटीकरण को कभी हम प्रेम और कभी बलात्कार कह देते हैं |
कमेन्ट==सेक्स केवल एक अभिव्यक्ति है प्रेम की और कुछ नहीं ,प्रेम को सिर्फ सेक्स या वासना मै बांधना गलत है !
मेरा कमेन्ट=यानि की प्रेम में सेक्स एक आवश्यक तत्व हैं ,अंततोगत्वा प्रेम सेक्स के रास्ते से ही अभिव्यक्ति पाता है |
प्रेम और सेक्स की जब हम बात करते हैं तो वह एक स्त्री और पुरुष के बीच प्रेम ,वह प्रेम जिसके किस्से कहानियों से हमारा सारा साहित्य भरा पड़ा लेकिन विषय को भटकाने के लिए ज्ञानी लोग भाई बहन के प्रेम ,माँ बेटे का प्रेम की बातें करने लगते हैं | इस विषय में मैं पूर्णता निश्चित हूँ कि यदि स्त्री /पुरुष में सेक्स का आनंद देने और लेने की सामर्थ्य नहीं हैं तो ऐसे स्त्री /पुरुष के प्रति किसी का भी प्रेम काफूर हो जाएगा | वायवी बातें करने में अच्छी लगती हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर हमें सच को स्वीकारना ही पड़ेगा |
सेक्स को प्रेम का नाम देने की परंपरा कभी ख़त्म होगी क्या ? वासना के प्रकटीकरण को कभी हम प्रेम और कभी बलात्कार कह देते हैं |
 एक विरोध= सेक्स केवलएक अभिव्यक्ति है प्रेम की और कुछ नहीं ,प्रेम को सिर्फ सेक्स या वासना मै बांधना गलत है !
यानि की प्रेम में सेक्स एक आवश्यक तत्व हैं ,अंततोगत्वा प्रेम सेक्स के रास्ते से ही अभिव्यक्ति पाता है |
प्रेम और सेक्स की जब हम बात करते हैं तो वह एक स्त्री और पुरुष के बीच प्रेम ,वह प्रेम जिसके किस्से कहानियों से हमारा सारा साहित्य भरा पड़ा लेकिन विषय को भटकाने के लिए ज्ञानी लोग भाई बहन के प्रेम ,माँ बेटे का प्रेम की बातें करने लगते हैं | इस विषय में मैं पूर्णता निश्चित हूँ कि यदि स्त्री /पुरुष में सेक्स का आनंद देने और लेने की सामर्थ्य नहीं हैं तो ऐसे स्त्री /पुरुष के प्रति किसी का भी प्रेम काफूर हो जाएगा | वायवी बातें करने में अच्छी लगती हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर हमें सच को स्वीकारना ही पड़ेगा |

Monday, 20 May 2013

मुझे लगता है कि किसी देश के राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में उस देश के मौसम का बहुत बड़ा योगदान होता है |

Saturday, 18 May 2013

" फेसबुक"=मानसिक स्तर पर एक दुसरे से जुड़ने के लिए एक नायाब उत्पाद लेकिन उपयोग करनेवाला यानि की हम इसका दुरपयोग करने में अपनी पूरी सामर्थ्य से जुट गए है खासकर भाषा के स्तर पर |सोचिये एक समय था जब हमारी बात सुनने वाला एक भी व्यक्ति नहीं था ,अब आप कुछ भी लिखते हैं और आपका लिखा सेकंडों में पूरी दुनिया में विस्तार पा लेता है |इसलिए बंधुओं मेरा निवेदन है, भाषा हमेशा सयंत होनी चाहिए |हम कितने भी कमीने क्यों न हो गए हों ,भाषा के स्तर पर तो हम शरीफ/ शालीन दिख ही सकते हैं |

मित्रों "कमीने" शब्द का इस्तेमाल मैंने जानबूझकर किया है और कमीने में स्वं को भी शामिल किया है | सोचिये "कमीने" शब्द जो की हमारी बोलचाल की भाषा में बुरी तरह से  शामिल है वह शब्द जब आपको आहत कर देता हैं | बहरहाल मैं मात्र इतना कहना चाहता हूँ कि जिस भाषा का प्रयोग हम अपने घर में अपने बच्चों के सामने करने से हिचकिचाते हैं वैसी भाषा का प्रयोग हम फेसबुक पर ना करें तो उचित होगा |  
अपनी पहचान के लिए
===============
तुम तुम हो
आईने के सामने
खड़े होने से मत डरो
आईना तुम्हें
सच सच बतायेगा
तुम्हारे चेहरे पर जमीं
हर पर्त को हटाएगा
तुम्हे आश्चर्य होगा
एक ब एक
तुम उस चेहरे को
पहचान नहीं पाओगे
लेकिन वह होगा तुम्हारा
असली चेहरा |
अपनी पहचान को
गुम मत होने दो
तुम्हारे आस पास
जो भी लोग हैं
उन्हें चैन की नींद सोने दो |
 
कुछ बेढंगा सा
==========
वह एक
प्यारी सी लड़की
जो मुझ पर मरती थी
वही आज मुझसे
बात बात पर लड़ती है |
क्या हुआ कि अब 
नाव भी
नदी के बहाव के साथ
बहने में डरती है  | 

Thursday, 16 May 2013

एकांत में
==========
एकाकीपन
मेरे भीतर तक
कुछ इस तरह
पैठ गया है कि
मै अकेले में भी
अकेला नहीं होता |
पैरों के
भारीपन से लगता है
जैसे पैरों पर कोई
पत्थर बैठ गया है | 

Wednesday, 15 May 2013

जब हम पथरा जाते हैं और हम भागना चाहते हैं तब बच्चे हमारा हाथ पकड़ कर कहते हैं की हमें चलना नहीं सिखाओगे |
इसी मजबूरी में
पति-पत्नी का रिश्ता
निभ जाता है
और हमें बताया जाता है
यह सात जन्मों का
होता नाता है |
औरत की यह नाराजगी कविता ,कहानी या डायरी से बाहर क्यों नहीं दिखाई पड़ती है ? मुझे तो लगता है कि औरत जोखिम उठाने को तैयार ही नहीं है | औरत के खिलाफ हो रहे सारे षड्यंत्रों का ठीकरा पुरुष प्रधान व्यवस्था पर फोड़ने से कुछ बदलने वाला नहीं है |
अगर करना है
मदमस्त हाथी की सवारी
करना होगा
जोखिम उठाने की तैयारी
पति भी अहिल्या
पत्नी भी अहिल्या
दोनों को चाहिए
परनारी/परपुरुष का स्पर्श
पथराये शरीरों को
मुक्ति चाहिए 

Monday, 13 May 2013

मान भी जाओ
मत जाओ
सूरज के पास
सूरज की रोशनी से
काम चलाओ

Saturday, 11 May 2013

मदर डे
=======
माँ को
एक दिन करो याद
फिर मत डालो खाद
अब आपके पास
पौधों की
नयी नयी नस्लें हैं
जो बगैर खाद और पानी के
एक बरस तक
ज़िंदा रह सकती हैं
हैप्पी मदर डे माँ |
कुछ बरस पहले तक जब हम मदर डे नहीं मनाते थे तो क्या माँ को हम प्यार नहीं करते थे ?  जननी  के प्रति श्रद्धा और  विश्वास क्या अभी अभी हमारे भीतर पैदा हुआ है ? हर रिश्ते के लिए सुनिश्चित करना एक दिन क्या उचित है ?  क्या आप जानते हैं ,रिश्तों का यह बाजारीकरण टेलिकॉम कंपनियों को अरबों / खरबों रुपयों का फायदा पहुंचाने के लिए सुनियोजित साजिश है ?

Friday, 10 May 2013

शब्द चुभते हैं
===========
वे द्रौपदी के शब्द
दुर्योधन के
कानों में फटे थे
और बारूद बनकर
उसकी छाती से चिपक गए

शब्द
लौटकर नहीं आते
तीर की तरह चुभते हैं
आहत करते हैं | 


शब्दों के इस्तेमाल में
हम क्यों
लापरवाही बरतते हैं ?

Thursday, 9 May 2013

कविता क्यों ?
=========
जब
खुद लिखना है
खुद ही पढ़ना है
वाजिब सवाल है
कविता क्यों लिखी जाए ?
कविता
पागलों की तरह
गलियों और चौबारों में
कवि को खोज रही है |
कवि
सत्ता के गलियारों में
न जाने किस आस में है खड़ा ?
कवि व्यस्त है
उसे आज और अभी
किसी न किसी
पुरस्कार या सम्मान की
व्यवस्था है करनी
कविता लिखने के लिए तो
पूरा जीवन है पड़ा |
कविता की आँख में आँसू है
और कवि
अपनी बात पर है अड़ा  |

Sunday, 5 May 2013

एक सच यह भी
==========
किसी के लिए
जान देना
आसान नहीं है दोस्त
तुम भी जानते हो
वे भी जानते हैं
वे इम्तिहान लेने से
बाज़ नहीं आते
और तुम बहाने बनाने से |  

Saturday, 4 May 2013

शादी की वर्षगाँठ पर
हरबार गाँठें कस जाती हैं
गाँठों को
महसूस करना हरबार
शादी की वर्षगाँठ पर
मुझे सुख देता है प्रिये |
कोई भी औरत जब किसी की प्रेमिका बनती है तो पत्नी बनने का सपना उसकी आँखों में पूर्वनियोजित  ढंग से बसा होता है | प्यार को अगर अधिकार न मिले तो मर जाता है प्यार | और तथाकथित प्यार को जब अधिकार मिल जाता है तब भी मर जाता है प्यार | मुझे तो लगता है प्यार जैसा कुछ होता ही नहीं है
प्यार कुछ भी नहीं सिर्फ अधिकार को पाने के लिए बिछाया गया जाल है |

Friday, 3 May 2013

आदमी और औरत
विपरीत ध्रुव, दोनों के शरीर एक दुसरे को खीचते हैं | कभी औरत आदमी की पत्नी कहाती है तो कभी प्रेमिका | शरीर का आकर्षण धीरे धीरे ख़त्म हो जाता है प्रेमिका मरने लगती है | हमारे बच्चों की जो माँ कहलाती है वह है पत्नी | शरीर का आकर्षण तो यहाँ भी ख़त्म लेकिन अब हमारे आकर्षण का केंद्र होते हैं हमारे बच्चे , इस वैकल्पिक आकर्षण की वजह से टिका रहता है पति पत्नी का सम्बन्ध तमाम सडन के बावजूद भी | ताज्जुब होता है सबंधों के सडांध की बू पति या पत्नी के नाक तक क्यों नहीं जाती ?