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झूठ
सम्बंधों को जोड़ता है
सच
सम्बंधों को तोड़ता है
झूठ और सच के बीच
आदमी
कभी रोता है
कभी हँसता है |
शीर्षक
कविता के अर्थ को
समेटता है |
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झूठ
सम्बंधों को जोड़ता है
सच
सम्बंधों को तोड़ता है
झूठ और सच के बीच
आदमी
कभी रोता है
कभी हँसता है |
शीर्षक
कविता के अर्थ को
समेटता है |
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