पुरानी डायरी के पन्नों से कुछ उबड़ खाबड़ सा
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जब तुम
मेरे पास थीं
तब मेरे अहं ने
तुम्हारे अस्तित्व को झुठलाया |
और
अधूरेपन का अहसास भी
अधूरा था
इसीलिए तो
अपने और तुम्हारे
बीच की दूरी भी
आधा ही तय कर पाया |
दूरियां कम हो सकती हैं
तय नहीं की जा सकती
यह सच
मुझे अब समझ में आया
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जब तुम
मेरे पास थीं
तब मेरे अहं ने
तुम्हारे अस्तित्व को झुठलाया |
और
अधूरेपन का अहसास भी
अधूरा था
इसीलिए तो
अपने और तुम्हारे
बीच की दूरी भी
आधा ही तय कर पाया |
दूरियां कम हो सकती हैं
तय नहीं की जा सकती
यह सच
मुझे अब समझ में आया
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