Saturday, 18 May 2013

" फेसबुक"=मानसिक स्तर पर एक दुसरे से जुड़ने के लिए एक नायाब उत्पाद लेकिन उपयोग करनेवाला यानि की हम इसका दुरपयोग करने में अपनी पूरी सामर्थ्य से जुट गए है खासकर भाषा के स्तर पर |सोचिये एक समय था जब हमारी बात सुनने वाला एक भी व्यक्ति नहीं था ,अब आप कुछ भी लिखते हैं और आपका लिखा सेकंडों में पूरी दुनिया में विस्तार पा लेता है |इसलिए बंधुओं मेरा निवेदन है, भाषा हमेशा सयंत होनी चाहिए |हम कितने भी कमीने क्यों न हो गए हों ,भाषा के स्तर पर तो हम शरीफ/ शालीन दिख ही सकते हैं |

मित्रों "कमीने" शब्द का इस्तेमाल मैंने जानबूझकर किया है और कमीने में स्वं को भी शामिल किया है | सोचिये "कमीने" शब्द जो की हमारी बोलचाल की भाषा में बुरी तरह से  शामिल है वह शब्द जब आपको आहत कर देता हैं | बहरहाल मैं मात्र इतना कहना चाहता हूँ कि जिस भाषा का प्रयोग हम अपने घर में अपने बच्चों के सामने करने से हिचकिचाते हैं वैसी भाषा का प्रयोग हम फेसबुक पर ना करें तो उचित होगा |  

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