शब्द चुभते हैं
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वे द्रौपदी के शब्द
दुर्योधन के
कानों में फटे थे
और बारूद बनकर
उसकी छाती से चिपक गए
शब्द
लौटकर नहीं आते
तीर की तरह चुभते हैं
आहत करते हैं |
शब्दों के इस्तेमाल में
हम क्यों
लापरवाही बरतते हैं ?
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वे द्रौपदी के शब्द
दुर्योधन के
कानों में फटे थे
और बारूद बनकर
उसकी छाती से चिपक गए
शब्द
लौटकर नहीं आते
तीर की तरह चुभते हैं
आहत करते हैं |
शब्दों के इस्तेमाल में
हम क्यों
लापरवाही बरतते हैं ?
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