Thursday, 29 October 2015

गलतियां बाबर ने की थी जुम्मन का घर फिर क्यों जले --अदम गोंडवी |
अदम गोंडवी जी की उपरोक्त पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लगता है कि बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया जा रहा है | इसको निम्न तरीके से लिखा जाता तो इससे साम्प्रदायिकता की बू खत्म हो जाती | 


बाबर की गलतियों का खामियाजा हम क्यों भरे 
कभी रामू का तो कभी जुम्मन का घर क्यों जले
मैं तुम पर करूँ
तुम मुझ पर करो शक
जो करते हैं
प्रेम में होने का ढोंग
उन्हें हासिल  है यह हक़ |

प्रेम में हासिल है
केवल एक ही हक़
करो एक दूसरे पर शक |

पहले भूकम्प कहाँ आते थे , मोदी के आने के बाद भूकम्प का आना शुरू हुआ | पेड़ों से फूल कहाँ तोड़े जाते थे , इस देश में बलात्कार तो केवल देवत्व प्राप्त पुरुष ही किया करते थे ,मोदी के आने के बाद इस बीमारी के लक्षण आम आदमी में दिखना शुरू हुए | पुरस्कार वापसी का सेहरा बांधे हुए सभी कवि,लेखक और तथाकथित प्रगतिशील ,जनवादी शायद सही कहते है कि मोदी के आने के पहले तो सब कुछ भ्रष्ट्राचार के तले ठीक-ठाक चल रहा था, चारो ओर शांति ही शांति थी, मोदी ने आकर शांति को भंग कर दिया |

अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर त्रिशंकु हो गये |
न इधर के रहे ,न उधर के रहे ,बेचारे न बजने वाला शंख हो गये |

सरकार ने पुरस्कार दिया ,सरकार को जनता ने चुना ,सच पूछिये तो इन्होने जनता के मुहं पर थूका है |

Sunday, 25 October 2015

एक हमसफ़र से कटती नहीं हैं जिंदगी
हर शहर में बदल जाता हमसफ़र तो अच्छा होता |

बहुवचन से अब डर नहीं लगता
इस उम्र में कोई भरम नहीं टिकता

हर शहर में बदल जाए अगर हमसफ़र
तो बताओ वह सफर कैसा होगा ?

हमसफ़र को कभी बेवफा मत कहना
बेवफाई को हमेशा खुद के नाम करना |

किसी को मिला हो अगर हमसफ़र
तो उसका पता ग़ालिब मुझे देना  

Tuesday, 20 October 2015

मजहब किताबों में क़ैद हैं
यह किला दुर्भेध है
कोई गीता कोई कहता कुरान है
सबकी अपनी अपनी दुकान है
मालिक बन बैठा इन दुकानों का
वह आदमी नहीं हैवान है
वेद की ऋचाएं और कुरान की आयतें
इनका मुख्य हथियार है
चलो चलें उस पार कहीं
यहाँ सुरक्षित नहीं इंसान है  |

Friday, 16 October 2015

वह मेरे एक अज़ीज़ मित्र की माँ थी लेकिन मेरे लिए मुझे पैदा करने वाली माँ से भी बढ़कर कल दिनांक ०५/१०/२०१५ को उनका देहांत हो गया |
तुमने मुझे
पैदा नहीं किया
गीली मिटटी को 
आकार तुमने ही दिया
अम्मा, मेरी स्मृतियों में
तुम हमेशा जीवित रहोगी |
तुम्हारा मानस पुत्र अवधेश






अम्मा, 
मैं कृष्ण तो नहीं हूँ 
लेकिन तुम यशोदा थीं
तुम्हारी मौत में शामिल है 
मेरा कुछ-कुछ मरना भी |


दो नंगे 
सदियाँ गुजार दी 
एक दूसरे को नंगा कहने में 
अबे नंगों 
रुखसत होने से पहले 
अपनी औलादों को तो
कपडे पहनना सिखलाओ
उन्हें नंगा छोड़कर मत जाओ |
सत्ता पुरष्कार उन्हीं लोगों को देती हैं जो सत्ता को suit करता है, सत्ता की विचारधारा का पक्षधर होता है, जिस समय यह पुरष्कार ग्रहण किया गया था क्या सत्ता का चेहरा इन कवियों/ लेखकों के मनमाफिक था ? सत्ता का चेहरा कभी नहीं बदलता,क्या ये बात पुरष्कार लेने वाले नहीं जानते थे ? 
नाटक जारी है |

एक-एक कर वापस कर रहे हैं ताकि चर्चा बनी रहे , नोबल पुरस्कार किसको मिला यह तो लोगों को याद नहीं रहता है ,अब किसे याद होगा कि अकादमी पुरस्कार किसको मिला और किसको नहीं | चलों हम भी उस पुरस्कार को वापस करने की घोषणा कर दें जो हमें मिला ही नहीं |

बहुमत से चुनी गयी सरकार के प्रधानमंत्री को रोज सैकड़ों अपशब्द कहे जाते हैं ,अपशब्द कहने वाले घर जाकर आराम से सो जाते हैं, अरे भाई अब और किस तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए देश के अकादमी पुरस्कार विजेता महान साहित्यकारों को |
देश के 
किसी भी हिस्से में 
कोई पेड़ गिरा 
हवाएँ तेज चली 
भूकम्प आया
इन सबकी जिम्मेदारी
आप उन पर ठोक देते हैं
आखिर कैसी अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहते हैं आप ?



अकादेमी पुरस्कार लौटाने की शहीदाना कवायद
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पिछले दिनों उदयप्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या पर आक्रोश में अपना अकादेमी पुरस्कार क्या लौटाया, हाल में भाजपा सरकार को सांप्रदायिक घोषित करते हुए नयनतारा सहगल और कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने भी अकादेमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है।
इन लेखकों के इस कदम की जहां कुछ लोगों ने सराहना की है वहीं कुछ लोग इसे इनका पैंतरा बता रहे हैं। देखा जाय तो इस कदम से भी सरकार के कान में जूं नही रेंगने वाली | पुरस्कार लौटाने वाले ये लेखको को कृतज्ञ होना चाहिए कि उनको उनकी साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए पुरस्कृात दिया गया | इससे प्राप्त यश का आप जगह जगह उल्लेख करते रहे। अकादेमी व सरकार के समारोहों में आप जाते रहे। आपकी कृतियों के अनेक भाषाओं में अनुवाद होते रहे। पहले उदयप्रकाश को लें। उदयप्रकाश ने गोरखपुर में जब अपने ही परिवार के महंत योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लिया तो क्यां यह इसी सरकार के नुमांइंदे का पुरस्कार नहीं था। । नयनतारा सहगल को लीजिए। इनसे पूछिए कि जब कांग्रेस में इतने घोटाले हो रहे थे, जब देश में इमरजेंसी लगाई गयी। इंदिरा गांधी की तानाशाही ने लोहिया और जयप्रकाश जैसे तेजस्वी नेताओं को मृत्यु के मुहाने तक पहुंचा दिया। उस वक्त इन्हों ने किस सुविधा का परित्यााग किया। अशेाक वाजपेयी == कांग्रेसी शासन की तानाशाही व हिंसा पर उन्होंंने एक भी शब्द न लिखा होगा ,पर गुजरात त्रासदी पर कविताएं लिखीं। इमरजेंसी की खुल कर मुखालफत की हो, ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं आया। भोपाल में गैस त्रासदी में हजारों लोग मारे गए। दुनिया कहती रही विश्व कविता उत्सव बंद कर दो। यह बोलते रहे: मुर्दो के साथ कोई मर नही जाता। उधर लोग मरते रहे बदहवास शहर छोड कर भागते रहे, इधर भारत भवन कविता उत्सव रचाता रहा। यह है अशेाक वाजपेयी का सच। जिंदगी भर सत्ता की दलाली करने वाला व्यक्ति जब सत्ता के विरोध की बात करता है उसकी नीयत पर शक तो होगा न |
सच तो यह है कि यदि आप सांप्रदायिकता के विरुद्ध हैं या थे तो यह काम आपको बहुत पहले करना चाहिए था। जैसे सार्त्र ने किया। नोबेल तक ठुकरा दिया। रामविलास शर्मा को लीजिए । उन्होंने जीवन में बहुत से पुरस्कार ठुकराए। पर संस्थाओं का अपमान नहीं किया। मात्र मूर्ति और प्रशस्तिपट्ट स्वीकार किया। उन्होंने केवल लिखा, लिखने की राजनीति नही की। किसी कांग्रेस किसी भाजपा की दलाली नहीं की। सरकारें तो सभी एक जैसी हैं। कोई भी दूध की धुली नहीं। अकादेमी ने कोई पाप थोडे न किया है। किया है सरकारी गुर्गों ने बिहार चुनाव जीतने के लिए सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के नाम पर। आप किसी मायने में यदि स्वतंत्र लेखक हैं तो आपको पुरस्काार लेना ही नहीं चाहिए था, तब तो कोई बात होती। रही बात पुरस्कार ठुकरा कर शहीद बनने की तो साहित्यिक जन इस लौटाने के पीछे की रणनीतियों से वाकिफ हैं। देश में इतनी मंहगाई है। 200रुपये किलो दाल है। प्याज दुर्लभ है। आम जन की हालत खस्ताा है। कोई जनसंगठन है जो इसे मुद्दा बना रहा हो। न ये चीजें लेखकों की प्राथमिकता सूची में हैं न सरकार के।क्यों नहीं मुजफ्फर नगर आदि के दंगों में सरकार की भूमिका के विरोध में लेखकों ने पुरस्कारों का बहिष्काार किया।
अंत में खेमों में बंटे ये कवि लेखक जो कुछ भी करते है उसके कारण राजनीति से जुड़े होते हैं वामपंथियों का तो कांग्रेस की गोद में बैठने का एकाधिकार है, तथाकथित जनवादी और प्रगतिशील कवि लेखक वही करते हैं जो उनके वामपंथी आका कहते हैं | जो लोग जिंदगी भर सत्ता की दलाली करते रहे वो आज सत्ता का विरोध करने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?

चंद सिरफिरों ने कुछ कहा 
आप बौखला गए 
क्या नहीं जानते आप कि 
देश की जनता आपको कितना प्यार करती है ?
नसीरुद्दीन शाह 
तुम्हें और तुम्हारी अदाकारी को शत-शत नमन |

करोड़ों फूल जो बरसाये 
उनका हिसाब रखना था 
किसी पागल ने एक पत्थर मारा

तो तुम्हें इस तरह न रूठना था |


ये कुकुरमुत्ते हैं 
उग आते हैं और हम लोग 
जो अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं 

इनके पीछे भेड़ की तरह चले जाते हैं |
धर्म के नाम पर
खेतों में बोयी जा रही है आग
आग की फसल
सिरफिरे काटेंगे तो मुश्किल होगी | 

Wednesday, 14 October 2015

दो नंगे
सदियाँ गुजार दी
एक दूसरे को नंगा कहने में
अबे नंगों
रुखसत होने से पहले
अपनी औलादों को तो
कपडे पहनना सिखलाओ
उन्हें नंगा छोड़कर मत जाओ  |

Tuesday, 13 October 2015

जब तक
राम को ज़िंदा रक्खोगे
रावण भी ज़िंदा रहेगा
रावण की जान
राम की नाभि में स्थित
अमृत-कलश में,
रावण नहीं होगा तो
राम को पूछेगा कौन ?

Sunday, 11 October 2015

चौसठ बरस का हो गया हूँ , सोच में नया-नया ,बूढ़े दोस्त पास नहीं फटकते | अनुभव का तड़का लग जाने से गलतियांऔर बेकूफ़ियाँ नहीं होती | सब कुछ नया नया सा है |

अपने को पुरनिया मत कहिये ,मर्यादा पर बात फिर करें अपनी सीमाओं का निर्धारण खुद करें और फिर उसमे स्वतंत्र होकर रहे | अस्सी की भी हो जाएंगी तो खुद को नया नया सा पाएंगी |
शिकारियों की बहादुरी
की कहानियाँ तो खूब लिखीं
दर्द उसका लिखो
जिसका शिकार होता है
जब तक शेरों को
लिखना नहीं आयेगा
शिकारी तो जांबाज ही कहा जायेगा | 
बहुत दिनों से रात में सोया नहीं हूँ मैं
कमबख्त किसी ने प्याला चुरा लिया

वह जब मरेगा भूख से ही मरेगा
कमबख्त किसी ने निवाला चुरा लिया

खुश थे चाँद और सूरज की रोशनी में हम
कम्बख्तों ने चाँद और सूरज चुरा लिया  

अलीबाबा पर भारी पड़ गये चालीस चोर
कम्बख्तों ने खुल जा सिमसिम का मंतर चुरा लिया

Tuesday, 6 October 2015

1)
वह मेरे एक अज़ीज़ मित्र की माँ थी लेकिन मेरे लिए मुझे पैदा करने वाली माँ से भी बढ़कर कल दिनांक ०५/१०/२०१५ को उनका देहांत हो गया |
तुमने मुझे
पैदा नहीं किया
गीली मिटटी को 
आकार तुमने ही दिया
अम्मा, मेरी स्मृतियों में
तुम हमेशा जीवित रहोगी |
तुम्हारा मानस पुत्र अवधेश

2)
अम्मा, 
मैं कृष्ण तो नहीं हूँ 
लेकिन तुम यशोदा थीं
तुम्हारी मौत में शामिल है 
मेरा कुछ-कुछ मरना भी |
ईश्वर और प्यार
कोरी बकवास |

कृत्रिम पौधे
न पैदा होते हैं
न बड़े होते हैं
मरते नहीं
वे अमर होते हैं |

Sunday, 4 October 2015

लाश को दर्द नहीं होता
मुर्दे को रोते हुए
आज तक किसी ने नहीं देखा
हम ज़िंदा होने का स्वांग करते हैं
हम खुश हैं
क्योंकि हम कभी नहीं रोते  |

Saturday, 3 October 2015

ऊपर आकाश में चिंतित गुरुघंटाल
यमराज से बोले कि
हमारे देश में
गाय की वजह से बहुत उपद्रव होते है,
जाओ और रातो-रात सारी गायों को उठा लाओ  
गाय की अनुपस्थिति में
लोगों भैंस को माँ मानने लगे
यमराज को हुक्म हुआ
जाओ अब सारी भैंसो को लेकर आओ
यमराज ने कहा
हुज़ूर फिर हिन्दुस्तान में
लोग दूध किसका पिएंगे
हुज़ूर मुस्करा कर बोले
चिंता मत करो तात
तब लोग बकरी का दूध पिएंगे
और देश में
गांधी के पैदा होने की संभावना बढ़ेगी  |    

Friday, 2 October 2015

किसी ने कहा नहीं , किसी ने मिलवाया नहीं ,किसी ने उसका पता बताया नहीं और सब लोग ईश्वर के अस्तित्व को मान लेते हैं ,है न आश्चर्यजनक | इतनी बड़ी दुनियाँ में ऐसी छोटी-छोटी मूर्खताएं होती रहती हैं सोनोरिटा |