झूठ बोलने से पहले
कसम खाने का रिवाज़ है
और सच
सच तो एक हसीन ख्वाब है
अब सच में
न कोई आब है,न कोई ताब है |
गीता और क़ुरान की आड़ में
हर रोज़ बोले जाते हैं करोड़ों झूठ
अफ़सोस होता है
जब सर्वज्ञाता, सर्वव्यापी ईश्वर भी
झूठ को पकड़ नहीं पाता है
और थक-हारकर
झूठ की भीड़ में शामिल हो जाता है |
कसम खाने का रिवाज़ है
और सच
सच तो एक हसीन ख्वाब है
अब सच में
न कोई आब है,न कोई ताब है |
गीता और क़ुरान की आड़ में
हर रोज़ बोले जाते हैं करोड़ों झूठ
अफ़सोस होता है
जब सर्वज्ञाता, सर्वव्यापी ईश्वर भी
झूठ को पकड़ नहीं पाता है
और थक-हारकर
झूठ की भीड़ में शामिल हो जाता है |
No comments:
Post a Comment