Saturday, 30 August 2014

याद आता है पंगत में बैठकर खाना
धीरे-धीरे चलकर पूड़ियों का आना 
रायते का दोने से बिखर जाना 
कद्दू की सब्ज़ी बैगन का भरता 
चटनी के साथ पापड़ का कुरकुराना
कुल्हड़ का बार-बार लुढ़क जाना
आखिर में मीठी बूंदियों का आना
उँगलियों को चाटना और फिर
मीठी उँगलियों को कुल्हड़ में डुबोना
पत्तल के साथ कुल्हड़ उठाना
और कूड़े के ढेर पर फेंक आना
कुत्तों के झुण्ड का जुट जाना
याद आता है पंगत में बैठकर खाना

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