Sunday, 4 March 2012

क्षितिज के पार


क्षितिज के पार



एक दीवार थी ,जो रोकती थी
एक ऊँगली थी ,जो टोकती थी
दीवार मैंने लांघ ली है और
ऊँगली मैंने तोड़ दी है
और अब रास्तें हैं 
यह रास्ते जहाँ ले जातें हैं
चला जाता हू
किसी मंजिल की दरकार नहीं है
और न ही जानना चाहता हू
क्षितिज के पार की हकीक़त
मैं नापना चाहता हू
रास्ते जो कभी ख़त्म नहीं होते

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