खरीद कर लाते हैं,
अपनी बगिया के फूल तो
हम पूजा में भी नहीं चढ़ाते हैं.
अनजाने ही सही, व्यवस्था की अव्यवस्था को और हष्ट पुष्ट बनाने में कुछ तो है ही हमारा भी योगदान.
खुदा और ईश्वर के चर्चे जिस दिन बन्द हो जाएंगे हम अमन पसन्द हो जाएंगे
रूहें कब्रिस्तान में फ़रमा रही हैं आराम
इंसानी बस्तियां अब दिखती कहाँ हैं जनाब.
भविष्य की लाश पर खड़े होकर वर्तमान सुधार रहे हैं
कमाओ खूब कमाओ अपने बच्चों का भविष्य बनाओ.
अपनी बगिया के फूल तो
हम पूजा में भी नहीं चढ़ाते हैं.
अनजाने ही सही, व्यवस्था की अव्यवस्था को और हष्ट पुष्ट बनाने में कुछ तो है ही हमारा भी योगदान.
खुदा और ईश्वर के चर्चे जिस दिन बन्द हो जाएंगे हम अमन पसन्द हो जाएंगे
रूहें कब्रिस्तान में फ़रमा रही हैं आराम
इंसानी बस्तियां अब दिखती कहाँ हैं जनाब.
भविष्य की लाश पर खड़े होकर वर्तमान सुधार रहे हैं
कमाओ खूब कमाओ अपने बच्चों का भविष्य बनाओ.
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