मासूमों की मौत पर खामोश खड़े रहे
इतना गिरे कि हम अब पशु भी नहीं रहे.
रूठ जाता है बचपन
फिर लौटकर नहीं आता
बुढ़ापे की शक्ल में लौटता है मगर
थके और उदास क़दमों से चलकर
हम खुद को नहीं बदलते
दुनियां को बदलने निकल पड़ते हैं.
इतना गिरे कि हम अब पशु भी नहीं रहे.
रूठ जाता है बचपन
फिर लौटकर नहीं आता
बुढ़ापे की शक्ल में लौटता है मगर
थके और उदास क़दमों से चलकर
हम खुद को नहीं बदलते
दुनियां को बदलने निकल पड़ते हैं.
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