1)
हर फटेहाल की मुकद्दर लालू जैसी नहीं होती |
भूखों को उपहार स्वरुप एक रोटी नहीं मिलती ||
2)
वह जीवट का आदमी था,
हर ठोकर पर खिलखिलाकर हँसता था |
3)
हर दर्द की एक मियाद होती है, मियाद के खत्म होने का तू इंतजार कर .
हाथ जोड़ कर.
4)
फ़िज़ा की रंगत
हवा का रुख अब शायद बदले ,
आखिर कब तलक
चलते रहेंगे वही पुराने जुमले |
5)
अँधेरे के आगोश में
रात को चैन से सो लेने दो.
6)
रात को दिन के
ऊजाले में कभी देखा है ?
7)
भूख उसके चेहरे पर पसरी थी.
ख्वाइश में उसकी एक रोटी थी.
8)
शतरंज में एक घोड़ा होता है जो ढाई घर चलता है. इन बुद्धिजीवियों की चाल का तो कुछ पता ही नहीं चलता है.
9)
उन गमो का जो आपने दिए,भी तो कुछ हिसाब कीजिए.
10)
मुझे मेरी ही नजरों में गिराने की साज़िश के लिये तुम्हारा शुक्रिया
मेरे दोस्त.
11)
एकांत में मेरा अस्तित्व काँपता है
भीड़ में मेरा व्यक्तित्व काँपता है आओ
एकांत और भीड़ से बचे
घर चलें.
हर फटेहाल की मुकद्दर लालू जैसी नहीं होती |
भूखों को उपहार स्वरुप एक रोटी नहीं मिलती ||
2)
वह जीवट का आदमी था,
हर ठोकर पर खिलखिलाकर हँसता था |
3)
हर दर्द की एक मियाद होती है, मियाद के खत्म होने का तू इंतजार कर .
हाथ जोड़ कर.
4)
फ़िज़ा की रंगत
हवा का रुख अब शायद बदले ,
आखिर कब तलक
चलते रहेंगे वही पुराने जुमले |
5)
अँधेरे के आगोश में
रात को चैन से सो लेने दो.
6)
रात को दिन के
ऊजाले में कभी देखा है ?
7)
भूख उसके चेहरे पर पसरी थी.
ख्वाइश में उसकी एक रोटी थी.
8)
शतरंज में एक घोड़ा होता है जो ढाई घर चलता है. इन बुद्धिजीवियों की चाल का तो कुछ पता ही नहीं चलता है.
9)
उन गमो का जो आपने दिए,भी तो कुछ हिसाब कीजिए.
10)
मुझे मेरी ही नजरों में गिराने की साज़िश के लिये तुम्हारा शुक्रिया
मेरे दोस्त.
11)
एकांत में मेरा अस्तित्व काँपता है
भीड़ में मेरा व्यक्तित्व काँपता है आओ
एकांत और भीड़ से बचे
घर चलें.
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