आस्तिकता और नास्तिकता पर होने वाली तमाम बहसों को सुनने और पढ़ने पर ऐसा क्यों लगता है कि हम एक घेरे में गोल गोल घूम रहे हैं ,जहाँ से चलते हैं फिर घूम कर वहीँ वापस आ जाते हैं |जब बच्चे के पैदा होते ही उसके धर्म का निर्धारण हो जाता है अब इसमें बच्चे का क्या दोष ? क्या इस व्यवस्था से निजात सम्भव है ? ढेरों मूर्खता पूर्ण विधियों द्वारा इन बच्चों को हम हिन्दू ,मुसलमान औए ईसाई बनाते हैं | काश, इन बच्चों को चुनने की आजादी होती और धर्म के नाम पर इंसानियत के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता |
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