Sunday, 3 November 2013

अल्फाजों से
जख्म बनते हैं
और नज्मों से हम
उन जख्मों पर मरहम लगाते हैं
सच पूछिए तो हम
न कुछ खोते हैं
और ना कुछ पाते हैं |

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