Saturday, 28 November 2015

जिन रिश्तों में मित्रता का थोड़ा भी अंश नहीं होता वे स्वाभाविक मौत मर जाते हैं और हम इन रिश्तों की मौत का जश्न मनाते है |

2)
चाँद की फितरत समझ न आती
शीतलता मुझे डराती है
रात के आँचल में
अब नींद नहीं आती है
सोचता हूँ उड़ जाऊं
सूरज के पास चला जाऊं
उसके दरवाजे पर जाने से
अब शर्म मुझे आती है |

3)
मजहबी किताबें 
जुल्म और सितम को हवा देती हैं ?

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