जिन रिश्तों में मित्रता का थोड़ा भी अंश नहीं होता वे स्वाभाविक मौत मर जाते हैं और हम इन रिश्तों की मौत का जश्न मनाते है |
2)
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चाँद की फितरत समझ न आती
शीतलता मुझे डराती है
शीतलता मुझे डराती है
रात के आँचल में
अब नींद नहीं आती है
अब नींद नहीं आती है
सोचता हूँ उड़ जाऊं
सूरज के पास चला जाऊं
सूरज के पास चला जाऊं
उसके दरवाजे पर जाने से
अब शर्म मुझे आती है |
अब शर्म मुझे आती है |
3)
मजहबी किताबें
जुल्म और सितम को हवा देती हैं ?
जुल्म और सितम को हवा देती हैं ?
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