Tuesday, 24 September 2013

पिता जी खुलेआम
सबके सामने
सिगरेट पीते थे
घर के आँगन में
शेर की तरह टहलते थे
मैंने पिया सिगरेट
खुलेआम सबके सामने
गुनाह किया
मुझे बागी करार दिया
पिता का झापड़
माँ का रोना
और बहन का उलाहना
सब याद है मुझे
माँ ने रोते हुए कहा था
अरे सिगरेट पीना है
अगर तुम्हारी मजबूरी
तो सबके सामने पियो
क्या यह है जरूरी |
बहन ने कहा था
कुछ तो
बड़ों की इज्ज़त किया करो
कैसे जीना है यह हम से सीखो
देखो मैं भी तो प्यार करती हूँ
बड़ों को पता न चल जाए
इस बात से डरती हूँ
इसलिए प्रेम भी छिपा के करती हूँ |
मैं आज तक
नहीं समझ पाया कि
मैंने किस तरह
उनकी इज्ज़त में बट्टा लगाया था ?
अरे भाई
मैं तो वही कर रहा था
जो मेरा बाप कर रहा था |
बहरहाल जब मैं पिता बना
तब कहीं जाकर मुझे
सबके सामने खुलेआम
सिगरेट पीने का हक मिला |
 

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