लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरष्कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके यह तो साबित हो गया कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर पहले से कुछ और गिर गया है, लेखन के स्तर और लेखक के स्तर पर चर्चा विषय से भटकना होगा शायद | विजय राय ने कहा कि मुझपर निर्णायक मंडल का दबाव था, किसी पुरष्कार वितरण के सन्दर्भ में निर्णायक मंडल के निर्णय को बदलने का दुस्साहस कोई सम्पादक क्यों करेगा |
अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कास लें |
अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कास लें |
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