मनीषा जी को लमही सम्मान क्यों लौटा देना चाहिए ?
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ऐसा करना जूरी के निर्णय का असम्मान होगा और लमही सम्मान का अपमान भी।
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लमही पत्रिका के प्रधान संपादक के एक इंटरव्यू में एक सवाल के जबाव में यह कहे जाने कि लगता है इस बार के सम्मान में निर्णायक मंडल से चूक हुई होगी, पर पत्रकार दयानंद पांडेय ने बात का बतंगड़ बना दिया है। जरा उनकी भाषा देखिए: '' आलोक मेहता और महेश भारद्वाज की तो यह दोनों लोग अब हद से अधिक बदनाम हो चुके हैं। आलोक मेहता की छवि अब पत्रकारिता में दलाली के लिए जानी जाती है। और कि राजा राम मोहन राय ट्रस्ट की केंद्रीय खरीद समिति के अध्यक्ष होने के नाते वह महेश भारद्वाज के लिए भी दलाली का काम खुल्लमखुल्ला कर रहे हैं। मेरे पास इस के एक नहीं अनेक प्रमाण हैं। मैं ने विजय राय को स्पष्ट रुप से कहा कि आप को इन तत्वों से बचना चाहिए। वह कुछ स्पष्ट बोले नहीं। हूं-हां कर के रह गए। मैं ने तब के दिनों शिवमूर्ति जी से भी इस बात का ज़िक्र किया। और कहा कि विजय राय जी को समझाइए क्यों कि यह तो रैकेट में फंस गए हैं। '' यानी उनके शब्दों में जूरी के मेंमबरान में एक आलोक मेहता दलाल हैं, वे महेश भारद्वाज के पक्ष में दलाली कर रहे हैं। दूसरे आखिर में उन्होंने मनीषा कुलश्रेष्ठ को ढीठ व बेशर्म कह कर लमही सम्मान लौटाने के लिए ललकारा है। यह वे दयानंद पांडेय हैं जिन्हें हिंदी संस्थान का सम्मान वीरेन्द्र यादव को मिल गया तो वे उसमें हिंदी संस्थान व मुलायम सरकार के यादववाद का पोषण देख रहे हैं। उन्हीं की जबानी सुनिये : ''अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गई थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है।'' --जब कि हिंदी संस्थान का पुरस्कार खुद उन्होंने भी झटका है, और कई बार झटका है। इसके लिए उन्होंने संस्थान के निदेशक की किताब पर समीक्षा भी लिखीं तथा उन्हें खुश करने का प्रयास किया। हिंदी साहित्य में कौन कहाँ खड़ा है यह सर्वविदित है लेकिन दयानंद अपने को इस हद तक पंक्तिपावन मानते हैं कि हिंदी संस्थान मे उन्हें यादववाद नजर आता है और लमही सम्मान की जूरी भ्रष्ट नजर आती है जिसके विज्ञापित होते ही इसका भान उन्हें हो गया था, यह वही बता रहे हैं। जब दयानंद पांडे को पता ही था कि जूरी पहले से ही भ्रष्ट है तो वह कैसा निर्णय करेगी , यह भी तो पता होगा। तब तो वे मनीषा का खुल्लमखुल्ला विरोध कर रहे थे। कि विजय राय महेश के हाथो बिक गए हैं और जब जूरी के निर्णय का सम्मान करते हुए और बाकायदा दिल्ली में पुरस्कार समारोह में संयोजक के रूप में उपस्थित होकर भी एक सवाल के जवाब में विजय राय ने अपने संपादकीय विवेक का परिचय देते हुए यह बात स्वीकार की कि लगता है जूरी से कुछ चूक हुई होगी तो इसे मनीषा जी का अपमान कह कर फतवा दे रहे हैं दयानंद पांडेय जी। । अब वे लखनऊ के बड़के क्रांतिकारी लेखक बनकर फतवा दे रहे हैं।लगता है विजय राय से उनकी कोई निजी खुन्नस है। विजय राय कम बोलते हैं, पर इतना कम भी नहीं कि उन पर बढ़ चढ़ कर आक्रमण कर सकने की हैसियत कोई जुटा सकें।
विजय राय को क्या एक व्यक्ति एक संयोजक के रूप में अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। क्या एक जूरी के असहमत होने के बावजूद पुरस्कार घोषित नहीं होते। क्या निर्णायक मंडल की राय से संयोजक का सर्वथा सहमत होना जरूरी है। यदि एक विवेकी संयोजक संपादक अपना रुख अलग रखते हुए यह राय जाहिर करता है कि लगता है प्रेमचंद की परंपरा के आलोक में कदाचित जूरी के फैसले में कहीं चूक हुई है तो इसमे हाय तोबा मचाने की क्या बात। यदि जूरी अपने निर्णय पर अडिग है और संयोजक ने पुरस्कार लौटाने की बात ही नही की है तो पुरस्कार लौटान की क्या जरूरत । मनीषा न सही प्रेमचंद परंपरा की कथाकार पर वे श्रेष्ठ युवा कथाकार तो हैं ही, इसमें किसे संदेह है। विजय राय ने केवल अपनी राय का इजहार किया है, वह भी ऐसा सवाल पूछे जाने पर। ऐसी असहमतियां किस पुरस्कार में नहीं होतीं। उन्होंने मनीषा कुलश्रेष्ठ पर न केवल विशेषांक निकाला बल्कि कहानी अंक में उनकी कहानी भी आलोचक की सम्मति के साथ छापी गयी है। इससे जाहिर है एक कथाकार के रूप में विजय राय मनीषा कुलश्रेष्ठ की खासी इज्जत करते हैं । पर लमही सम्मान के लिए प्रेमचंद की कथा परंपरा के वाहक जिस तरह के कद्दावर लेखक की छवि उनके मन में होगी, वह शायद मनीषा में उन्हें न दिखी हो।
इस प्रकरण में कथाकार संजीव जी की बात भी उछाली गयी है। संजीव निस्संदेह एक बड़े कथाकार हैं। वे यदि ब्लैक एंड ब्वाइट में यह बात कह रहे हैं तो यह बात सुनी जानी चाहिए। वे कभी मुंहदेखी कहने वाले लेखक नहीं रहे। जिसके लोकार्पण में जाते हैं, यदि कहानी या उपन्यास कमजोर है तो वे सबके सामने यह बात कहते हैं। यह बात दुनिया जानती है। उनके कहे का हम सबको सम्मान करना चाहिए।
लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरस्कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके दयानंद जी ने यह साबित कर दिया है कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर इस हद तक गिर गया है। विजय राय ने यह कहां कहा है कि मुझ पर निर्णायक मंडल का दबाव था,निर्णायक मंडल ने जो फैसला दिया, उसे अंतत: उन्होंने माना और दिल्ली जाकर पुरस्कार दिया। अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त स्थानिक गंदी कुत्सित राजनीति के कुरूप चेहरे को पहचानें। विजय राय जैसे संजीदा तथा जाने पहचाने संपादक पर अपनी अधीर टिप्पणियों का मलवा उछालना उचित नहीं है | विजय राय न तो कोई सतही टिप्पणी कभी करते हैं, न इस तरह की राजनीति में यकीन रखते हैं। जो विजय राय को जानते हैं वे इस राय से सहमत होंगे।
ऐसी स्थिति में, जब कि विजय राय ने निजी राय जाहिर की है,वह भी 'लगता है' वाले भाव में |अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कस लें |
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ऐसा करना जूरी के निर्णय का असम्मान होगा और लमही सम्मान का अपमान भी।
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लमही पत्रिका के प्रधान संपादक के एक इंटरव्यू में एक सवाल के जबाव में यह कहे जाने कि लगता है इस बार के सम्मान में निर्णायक मंडल से चूक हुई होगी, पर पत्रकार दयानंद पांडेय ने बात का बतंगड़ बना दिया है। जरा उनकी भाषा देखिए: '' आलोक मेहता और महेश भारद्वाज की तो यह दोनों लोग अब हद से अधिक बदनाम हो चुके हैं। आलोक मेहता की छवि अब पत्रकारिता में दलाली के लिए जानी जाती है। और कि राजा राम मोहन राय ट्रस्ट की केंद्रीय खरीद समिति के अध्यक्ष होने के नाते वह महेश भारद्वाज के लिए भी दलाली का काम खुल्लमखुल्ला कर रहे हैं। मेरे पास इस के एक नहीं अनेक प्रमाण हैं। मैं ने विजय राय को स्पष्ट रुप से कहा कि आप को इन तत्वों से बचना चाहिए। वह कुछ स्पष्ट बोले नहीं। हूं-हां कर के रह गए। मैं ने तब के दिनों शिवमूर्ति जी से भी इस बात का ज़िक्र किया। और कहा कि विजय राय जी को समझाइए क्यों कि यह तो रैकेट में फंस गए हैं। '' यानी उनके शब्दों में जूरी के मेंमबरान में एक आलोक मेहता दलाल हैं, वे महेश भारद्वाज के पक्ष में दलाली कर रहे हैं। दूसरे आखिर में उन्होंने मनीषा कुलश्रेष्ठ को ढीठ व बेशर्म कह कर लमही सम्मान लौटाने के लिए ललकारा है। यह वे दयानंद पांडेय हैं जिन्हें हिंदी संस्थान का सम्मान वीरेन्द्र यादव को मिल गया तो वे उसमें हिंदी संस्थान व मुलायम सरकार के यादववाद का पोषण देख रहे हैं। उन्हीं की जबानी सुनिये : ''अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गई थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है।'' --जब कि हिंदी संस्थान का पुरस्कार खुद उन्होंने भी झटका है, और कई बार झटका है। इसके लिए उन्होंने संस्थान के निदेशक की किताब पर समीक्षा भी लिखीं तथा उन्हें खुश करने का प्रयास किया। हिंदी साहित्य में कौन कहाँ खड़ा है यह सर्वविदित है लेकिन दयानंद अपने को इस हद तक पंक्तिपावन मानते हैं कि हिंदी संस्थान मे उन्हें यादववाद नजर आता है और लमही सम्मान की जूरी भ्रष्ट नजर आती है जिसके विज्ञापित होते ही इसका भान उन्हें हो गया था, यह वही बता रहे हैं। जब दयानंद पांडे को पता ही था कि जूरी पहले से ही भ्रष्ट है तो वह कैसा निर्णय करेगी , यह भी तो पता होगा। तब तो वे मनीषा का खुल्लमखुल्ला विरोध कर रहे थे। कि विजय राय महेश के हाथो बिक गए हैं और जब जूरी के निर्णय का सम्मान करते हुए और बाकायदा दिल्ली में पुरस्कार समारोह में संयोजक के रूप में उपस्थित होकर भी एक सवाल के जवाब में विजय राय ने अपने संपादकीय विवेक का परिचय देते हुए यह बात स्वीकार की कि लगता है जूरी से कुछ चूक हुई होगी तो इसे मनीषा जी का अपमान कह कर फतवा दे रहे हैं दयानंद पांडेय जी। । अब वे लखनऊ के बड़के क्रांतिकारी लेखक बनकर फतवा दे रहे हैं।लगता है विजय राय से उनकी कोई निजी खुन्नस है। विजय राय कम बोलते हैं, पर इतना कम भी नहीं कि उन पर बढ़ चढ़ कर आक्रमण कर सकने की हैसियत कोई जुटा सकें।
विजय राय को क्या एक व्यक्ति एक संयोजक के रूप में अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। क्या एक जूरी के असहमत होने के बावजूद पुरस्कार घोषित नहीं होते। क्या निर्णायक मंडल की राय से संयोजक का सर्वथा सहमत होना जरूरी है। यदि एक विवेकी संयोजक संपादक अपना रुख अलग रखते हुए यह राय जाहिर करता है कि लगता है प्रेमचंद की परंपरा के आलोक में कदाचित जूरी के फैसले में कहीं चूक हुई है तो इसमे हाय तोबा मचाने की क्या बात। यदि जूरी अपने निर्णय पर अडिग है और संयोजक ने पुरस्कार लौटाने की बात ही नही की है तो पुरस्कार लौटान की क्या जरूरत । मनीषा न सही प्रेमचंद परंपरा की कथाकार पर वे श्रेष्ठ युवा कथाकार तो हैं ही, इसमें किसे संदेह है। विजय राय ने केवल अपनी राय का इजहार किया है, वह भी ऐसा सवाल पूछे जाने पर। ऐसी असहमतियां किस पुरस्कार में नहीं होतीं। उन्होंने मनीषा कुलश्रेष्ठ पर न केवल विशेषांक निकाला बल्कि कहानी अंक में उनकी कहानी भी आलोचक की सम्मति के साथ छापी गयी है। इससे जाहिर है एक कथाकार के रूप में विजय राय मनीषा कुलश्रेष्ठ की खासी इज्जत करते हैं । पर लमही सम्मान के लिए प्रेमचंद की कथा परंपरा के वाहक जिस तरह के कद्दावर लेखक की छवि उनके मन में होगी, वह शायद मनीषा में उन्हें न दिखी हो।
इस प्रकरण में कथाकार संजीव जी की बात भी उछाली गयी है। संजीव निस्संदेह एक बड़े कथाकार हैं। वे यदि ब्लैक एंड ब्वाइट में यह बात कह रहे हैं तो यह बात सुनी जानी चाहिए। वे कभी मुंहदेखी कहने वाले लेखक नहीं रहे। जिसके लोकार्पण में जाते हैं, यदि कहानी या उपन्यास कमजोर है तो वे सबके सामने यह बात कहते हैं। यह बात दुनिया जानती है। उनके कहे का हम सबको सम्मान करना चाहिए।
लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरस्कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके दयानंद जी ने यह साबित कर दिया है कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर इस हद तक गिर गया है। विजय राय ने यह कहां कहा है कि मुझ पर निर्णायक मंडल का दबाव था,निर्णायक मंडल ने जो फैसला दिया, उसे अंतत: उन्होंने माना और दिल्ली जाकर पुरस्कार दिया। अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त स्थानिक गंदी कुत्सित राजनीति के कुरूप चेहरे को पहचानें। विजय राय जैसे संजीदा तथा जाने पहचाने संपादक पर अपनी अधीर टिप्पणियों का मलवा उछालना उचित नहीं है | विजय राय न तो कोई सतही टिप्पणी कभी करते हैं, न इस तरह की राजनीति में यकीन रखते हैं। जो विजय राय को जानते हैं वे इस राय से सहमत होंगे।
ऐसी स्थिति में, जब कि विजय राय ने निजी राय जाहिर की है,वह भी 'लगता है' वाले भाव में |अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कस लें |
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