Tuesday, 21 January 2014

बड़े बड़े नामचीन साहित्यकार केजरीवाल की छोटी छोटी और ओछी ओछी हरकतों के समर्थन में केजरीवाल के प्रवक्ता की भूमिका में क्यों दिखाई पड़ते हैं ? मित्र दयानंद पाण्डेय का यह कथन="हिंदी के कुछ लेखकों की इस बाबत जो लिजलिजी भाऊकता फ़ेसबुक पर दिखी, उस पर भी तरस बहुत आया। साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल अब क्यों नहीं है," बहुत ही सटीक टिपण्णी है  | 

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