Thursday, 24 January 2013

हर रोज मेरे पास से
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मैं नहीं पहचानता कविता को
क्योकि मैं कवि नहीं हूँ |
कई बार
मुझे छूती हुई
चिकोटी काटती हुई
मेरे  पास से
गुजर जाती है
कविता मुस्कराती हुई |
मैं नहीं पहचानता कविता को
क्योकि मैं कवि नहीं हूँ |
लेकिन वह जानती है मुझे
किसी को हर रोज
छूता हुआ 
चिकोटी काटता हुआ
इतने करीब से
कोई योहीं नहीं गुजरता |
वह मुस्कराती है
मुझे देखकर इस तरह
न जाने कब से
जानती है मुझे कविता |
 

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