कल के लिए का दिसंबर अंक। अंक की शुरुआत विष्णु खरे की दमदार कविताओं से हुई है और उस पर उतना ही धारदार आलेख कुमार मुकुल का है। नैरेटिव की जो मजबूत परम्परा विष्णु खरे ने अपने पूर्वजों से आयत्त की है उसका घनत्व युवा कवियों में उतना प्रभावी नहीं है। इस राह पर चलने वाले कवियों में गीत चतुर्वेदी, व्योमेश शुक्ल तथा उमाशंकर चौधरी हैं। इस अंक में चौधरी की कविताऍं भी हैं अपने आख्यान के बलबूते वे इन दिनों चर्चा में हैं। किसी को उनका नैरेटिव उबाऊ लगता है तो किसी को उसमें कविता का चरम बोलता नजर आता है। पर जो भी हो, उमाशंकर को देखना होगा कि इस नैरेटिव में वह वक्रता और व्यंजना ओझल न होने पाए जिससे अच्छी कविता का जन्म होता है। कमलिनी दत्त ने स्त्री समाज और कला पर निर्मम व्याख्या प्रस्तुत की है। मन्नू की बातचीत उनके जीवन के अंतरंग पक्ष पर आधारित है। वैभव सिंह तेजी से पहचान बना रहे युवा कथा आलोचकों में हैं। विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों में कल्पना और यथार्थ के विनियोग पर अच्छी तहरीर पेश की है। कृष्ण बिहारी की कहानी षटकोण उम्दा है।अपर्णा मनोज की भाषा काव्यात्मकता का एक सच्चा उदाहरण है। उमेश चौहान का लोक कवि उनके आल्हा में उभर कर सामने आया है । इसमें पर्याप्त समकालीन कथ्य भी अंतनिर्हित है। भारतीय जीवन की दुरावस्थाऍ—छाप कर कुबेरदत्त की याद आपने जीवित कर दी है। पर दुरावस्थाऍं को दुरवस्थाऍं होना चाहिए। लेखक संगठनों पर अच्छी बहस है । पर एक बात यह भी सच है कि ये संगठन अब गैरमहत्व के हो चुके हैं। तमाम औचित्यपूर्ण मुद्दों पर पार्टी लाइन निहारने वाले ये संगठन आज बेमानी हो चुके हैं। जरूरत है इस बुझती मशाल को और ईधन मुहैया कराना ताकि लेखकों का जो उद्देश्य प्रेमचंद ने बताया था, वह पूरा हो सके |
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