Monday, 7 January 2013

बगावत अधूरी है 
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अकेले
एकांत में पड़े पड़े
कभी कभी मैं
टुच्ची सहानुभूति
चाहने लगता हूँ |
मेरे भीतर से
एक आदमी निकलकर
मूंछों को ऐंठता हुआ
लिंग को रगड़ता हुआ
हस्तमैथुन में
व्यस्त हो जाता है |
कनखियों से
चारो ओर देखता 
आश्वस्त मैं
उस आदमी को
जल्दी से
निगल जाता हूँ
मछलियां खाने के बाद
सन्यासी की मुद्रा में
खड़ा हो जाता हूँ |
मैं नंगा होना चाहता हूँ
लेकिन मेरे लिंग की
पूजा हो
यह निश्चित हो |
मैं भूमिगत
बागी होना चाहता हूँ
बाहर आधुनिक और
घर के भीतर
परम्परा को
कैद रखना चाहता हूँ |
देहरी से बाहर
पाँव निकालने पर
परम्परा को
टाँग तोड़ने की धमकी
यह हमारे
आधुनिक होने की सीमा है
इसीलिए 
बगावत का स्वर धीमा है |

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