कितना आसान होता है घर में सारी सुख सुविधाओं के बीच बैठकर कविता,कहानी के माध्यम से अपने आक्रोश को व्यक्त कर देना | कितना कृत्रिम है यह आक्रोश और शायद इसीलिये प्रभावी भी नहीं |
दर्द को देखना
सुखद है ,
दुखद है
दर्द को भोगना |
दर्द को देखना
सुखद है ,
दुखद है
दर्द को भोगना |
No comments:
Post a Comment