Sunday, 1 March 2015

साहित्य में "कुनबावाद" प्रभावी है | पूरा का पूरा कुनबा साथ-साथ चलता है | कवि ,प्रकाशक और आलोचक  अब इस कुनबे में पाठक भी जुड़ने लगे हैं |
पूरा का पूरा तंत्र
साहित्य में भी जनतंत्र
कविता
अगर व्यवस्था के साथ चलेगी
तभी तो पुरष्कृत होगी
साहित्य आईना है तो
कविता भी तो कीचड़ में सनी ही दिखेगी  |

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