Thursday, 7 April 2016

कौन कहता है कि हम संवेदनहीन हो गए है ? किसी की ह्त्या होने या किसी के आत्महत्या करने पर हम उसकी जाति और उसका धर्म जानने में थोड़ा भी विलम्ब नहीं करते | हमारी एक आवाज़ पर लाखों लोग मोमबत्तियां लेकर जंतर-मंतर पर इकट्ठा हो जाते हैं | लाशों के लिए ऐसा जज्बा आपने कभी देखा हो तो बताएं ? 
संवदेनहीन होने का इल्जाम बेमानी है 
प्रगतिशीलता की यही तो निशानी है |

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