कौन कहता है कि हम संवेदनहीन हो गए है ? किसी की ह्त्या होने या किसी के आत्महत्या करने पर हम उसकी जाति और उसका धर्म जानने में थोड़ा भी विलम्ब नहीं करते | हमारी एक आवाज़ पर लाखों लोग मोमबत्तियां लेकर जंतर-मंतर पर इकट्ठा हो जाते हैं | लाशों के लिए ऐसा जज्बा आपने कभी देखा हो तो बताएं ?
संवदेनहीन होने का इल्जाम बेमानी है
प्रगतिशीलता की यही तो निशानी है |
संवदेनहीन होने का इल्जाम बेमानी है
प्रगतिशीलता की यही तो निशानी है |
No comments:
Post a Comment