अपनी रचना के प्रति मोह अपनी संतान के प्रति मोह जैसा ही होता है और इस मोह से मुक्त होना असम्भव न भी हो तो मुश्किल तो अवश्य ही है | कोई ऐसा रचनाकार बताइयेगा जिसने अपने लिखे पूरे उपन्यास की पांडुलिपि फाड़ कर फेक दी हो | आधी अधूरी लिखी कविताओं के प्रति वह मोह नहीं होता, जब कोई कवि अपनी लिखी किसी रचना को कविता मान लेता है तब उसके लिए उसे फाड़कर फेंक देना आसान नहीं होगा शायद |
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