Friday, 24 March 2017

जो कवि अपनी पीठ पर चाबुक मारने से डरता है |
प्रगतिशील, जनवादी और वैज्ञानिक चेतना से कैसे लैस हो सकती है उसकी कविता ?


रस्सी देखकर 
सांप-सांप चिल्लाते हो 
तुम बेवजह हमें क्यों डराते हो ?


अल्पसंख्यकों को बीजेपी से डराना है 
जीत का यह नुस्खा पड़ गया पुराना है

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