Saturday, 20 June 2020

५० बरस पहले की है बात लड़का और लड़की सजातीय नहीं थे किशोरावस्था को पार कर यौवन की दहलीज पर जैसा की अक्सर होता है एक लड़के को एक लड़की से प्यार हो गया. लड़की उसके सपनों में आने लगी रात रात भर रुलाने लगी. लड़के ने चाहा खुद को व्यक्त करना लड़की ने कहा "कुछ मत कहना, चुप रहना' लड़का पन्नों पर खुद को व्यक्त करता रहा और कहता रहा मौन मुझको तुम तक सम्प्रेषित नहीं कर पा रहा है,मुझे भाषा चाहिए जब हम प्रेम में होते हैं मुश्किल होता है प्रेम कहना और भी मुश्किल होता है प्रेम को बिना कहे चुप रहना लड़की को शायद मौन पढ़ना आता था इसीलिए वह हर बार कहती "चुप रहना ,कुछ मत कहना एक दिन एकांत में लड़के ने खुद को भाषा में व्यक्त कर दिया और कहा " आओ घर बनाते हैं " लड़की फिर बैठ न सकी उठ कर चली गयी लड़का भौचक्का रह गया और उसके ज़ेहन में कुछ पंक्तिया कौंधी -- मेरे पास बैठी मेरी हथेलियों पर चन्दन मलती रही चलते वक़्त उसी हथेली पर तुमने अंगारा रख दिया. आइये इस कविता की हक़ीक़त बताता हूँ.आखिर क्या हुआ कि हथेलियों पर चन्दन का मलना स्थगित हुआ. जीवन में पहली और अंतिम बार मैंने प्रणय निवेदन " चलो घर बनाते हैं" कहकर किया.,और चूँकि घर बनाने में खुद की इच्छा होते हुए भी अपनी पारिवारिक और सामाजिक दबावों के कारण अपनी सहभागिता सुनिश्चित नहीं कर पा रही थी इसलिए हथेलियों पर चन्दन का मलना स्थगित हुआ .यह स्थगन मेरे लिए अंगारा रखने के सामान था.इसलिए हथेली पर सिद्धपीठ और तीर्थ का उगना संभव हुआ. कई दिनों के अंतराल के बाद लड़का अपनी बात पुनः कहने पहुंचा तो उसे पता चला की लड़की की शादी तय हो गयी है. शादी में लड़के को पूरे मान सम्मान के साथ बुलाया गया और उसी रात लड़के ने कविता लिखी --- चंद रोज और फिर हम तुम दोनों अपने अपने घेरों में कैद एक दूसरे की पहुँच से दूर अनुपस्थित में भी एक दूसरे से जुड़ जायेंगे हम अचानक अपनी उम्रों से बहुत छोटे हो जायेंगे. मेरा बच्चा मुझे पापा तुम्हारा बच्चा तुम्हे माँ कहकर जगायेगा अपनी तोतली भाषा में हमें बड़े होने का अहसास कराएगा. बार बार छोटे और फिर बड़े होने की इस प्रकिया में हम न छोटे और न बड़े ही रह पाएंगे एक दिन दहलीज पर खड़े -खड़े देखेंगे क़ि हमारे बच्चे हमसे भी बड़े हो गए हैं. अवधेश निगम
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9:55 PM को देखा

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