शहर अब भी एक संभावना है : पुनर्पाठ
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नए साल पर शुभकामनायें देने की औपचारिकता निभाता हूँ
आइये नए साल के शुरुआत की कहानी आपको सुनाता हूँ
जुटेंगे नामचीन कवियश:प्रार्थी कवि-कवयित्रियां
शहर के किसी सभागार में आयोजित कविता पाठ में
अरसे से सुनाई नहीं जिन्होनें कविताएं
सुनने वाला ही नहीं है अब चाय पर भी तो कोई
किन्तु जश्ने न्यू इयर पर वे कूकेंगे
जनता के नाम कोई नया मंत्र फूँकेंगे
जुटने वालों में फूल -पत्ती कवित्रियों की भरमार होगी
होंगे एकाधिक गांधीवादी कवि भी संतुलन के नाम पर
अध्यक्षता के लिए मुफीद
पर बूढे अधेड़ तो बिल्कुल नहीं
बहुत ताकझांक करते हैं ये बुड्ढे
कविताओं से नहीं,ये देहभाषा से पहचाने जाते हैं अब |
अभी बची है स्त्रीनविमर्श में आग
दलित विमर्श के नाम पर अरण्यरोदन
नोटबंदी की आह
अभी बची है पेंदे में विदा होती हुई युवावस्था की गरमाई
अभी बचा है शब्दों में शील
यों रचनात्मकता में कुछ भी नहीं होता अश्लीैल
अभी शब्दों के उपवन में कँवल खिलाने के दिन है |
चैट बाक्सं में फूलों को उतनी धूप नहीं मिलती
जो जाड़े के दिनों में या नए साल की उतरती हुई
दुर्लभ धूप में मिलती है
शहर अब भी एक संभावना है।
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नए साल पर शुभकामनायें देने की औपचारिकता निभाता हूँ
आइये नए साल के शुरुआत की कहानी आपको सुनाता हूँ
जुटेंगे नामचीन कवियश:प्रार्थी कवि-कवयित्रियां
शहर के किसी सभागार में आयोजित कविता पाठ में
अरसे से सुनाई नहीं जिन्होनें कविताएं
सुनने वाला ही नहीं है अब चाय पर भी तो कोई
किन्तु जश्ने न्यू इयर पर वे कूकेंगे
जनता के नाम कोई नया मंत्र फूँकेंगे
जुटने वालों में फूल -पत्ती कवित्रियों की भरमार होगी
होंगे एकाधिक गांधीवादी कवि भी संतुलन के नाम पर
अध्यक्षता के लिए मुफीद
पर बूढे अधेड़ तो बिल्कुल नहीं
बहुत ताकझांक करते हैं ये बुड्ढे
कविताओं से नहीं,ये देहभाषा से पहचाने जाते हैं अब |
अभी बची है स्त्रीनविमर्श में आग
दलित विमर्श के नाम पर अरण्यरोदन
नोटबंदी की आह
अभी बची है पेंदे में विदा होती हुई युवावस्था की गरमाई
अभी बचा है शब्दों में शील
यों रचनात्मकता में कुछ भी नहीं होता अश्लीैल
अभी शब्दों के उपवन में कँवल खिलाने के दिन है |
चैट बाक्सं में फूलों को उतनी धूप नहीं मिलती
जो जाड़े के दिनों में या नए साल की उतरती हुई
दुर्लभ धूप में मिलती है
शहर अब भी एक संभावना है।
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